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सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हत्‍या...

मुझे सजा होनी चाहिए,
वह भी फांसी की,
क्‍यों,
क्‍योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्‍या करती हूं...
कभी अपने आत्‍मसम्‍मान को,
तो कभी अपने अस्तित्‍व को,
मैं नित नए तरीको से कत्‍ल करती हूं...
--
ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्‍यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...

9 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

एक गंभीर चिन्तन्।

SCORLEO ने कहा…

सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...


अनुपम एवं उत्कृष्ट भाव लिए... शब्दों कि जादूगरनी हैं आप...

Anand Rathore ने कहा…

मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को.

paagal ho tum... main bhi pagal hoon... pagalpana kar rahe hain hum...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हर एक के दर्द को लिख दिया है ...

Saras ने कहा…

बहुत सुन्दर ...अंतस को छूती रचना

sushma 'आहुति' ने कहा…

गहन अभिवयक्ति......

expression ने कहा…

क्या कहूँ..निःशब्द हूँ.........

बेहतरीन अभिव्यक्ति..

अनु

रश्मि प्रभा... ने कहा…

http://www.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_14.html

संजय भास्‍कर ने कहा…

.....अंतस को छूती रचना