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सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हत्‍या...

मुझे सजा होनी चाहिए,
वह भी फांसी की,
क्‍यों,
क्‍योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्‍या करती हूं...
कभी अपने आत्‍मसम्‍मान को,
तो कभी अपने अस्तित्‍व को,
मैं नित नए तरीको से कत्‍ल करती हूं...
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ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्‍यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मां, तू बहुत याद आती है...




मां, तू बहुत याद आती है...
ठीक सुबह की नींद सी मीठी तेरी याद,
अक्‍सर रात को नींद न आने वाला दर्द बन जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है,
पलकों के झपकने के नित्‍यकर्म में,
जैसे कभी आंखों में कुछ गिरने पर,
वो फड़फड़ा जाती हैं,
मां, तू बहुत याद आती है...
खाली प्रेम पत्र सा है तेरा नेही हृदय,
न जताने पर अपार संभावनाओं से भरा,
लेकिन जब जताती है,
तो पन्‍नों की कमी पड़ जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है...

अनिता शर्मा

बुधवार, 28 मार्च 2012

प्रतीक्षा

मैं कुछ लिखना चाहती हूं... लेकिन शब्‍द कहीं खो गए हैं. मैं कुछ सोचना चाहती हूं... लेकिन भाव कहीं सो गए हैं. मुझे लिखना होगा शब्‍दों के मिलने तक. मुझसे सोचना होगा, भावों के जगने तक... ...अनिता शर्मा