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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

बेचैन आयु

मुझे माफ करना जीवन
के मैं तुम्हें न जी सकी,
मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी...
झूठी परंपराओं की वेदी पर...
अपने नेह को घोट पाना
कितना मुश्किल है
मेरे नेही
तुमने भला कब जाना
इस से तो अच्छा है
पिघल कर घुल जाउं,
लिप्त हो जाउं
तुम में
तुम्हारी प्राण वायु में
खो जाउं वाष्प सी कहीं
कि लौट कर
वापस न आ पाऊं
इस बेचैन आयु में...

17 टिप्‍पणियां:

Er. Ankit Kumar Gautam ने कहा…

acchha likhti hain.

likhti rahiyega :)

aur hamare bhi vichaar padhein
http://www.ankitkumargautams.blogspot.com
aur
http://www.blondmedia.blogspot.com

par aur unhe bhi join karein

Raaj ने कहा…

मुझे माफ करना जीवन

के मैं तुम्हें न जी सकी,
मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी...

अति सुन्दर !























बहुत ही भाव भीना चित्रण उकेरा है आपने जीवन की इस निर्मम कटु सचाई का.






















बहुत बढ़िया.






















राज

Shekhar kumawat ने कहा…

pata nahi kya dar he tumhe


shekhar kumawat

neelima garg ने कहा…

मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी.....why....

pallavi trivedi ने कहा…

जीवन को न जिया जाये तो मुझे संदेह है की ये माफ़ करता है.....अच्छी कविता!

kunwarji's ने कहा…

ह्रदयस्पर्शी कविता!

मार्मिक....

कुंवर जी,

arvind ने कहा…

aapki rachna me dard our katu satya jhalakata hai.

M VERMA ने कहा…

वापस न आ पाऊं
इस बेचैन आयु में...
बेचैनी भरी रचना पर सुन्दर

Udan Tashtari ने कहा…

भावों की उम्दा अभिव्यक्ति!

prashan sharma ने कहा…

aapki har rachana kabile tarif hain...apse hi kuchh likhne ki prerna milti hain..keep it up

anjana ने कहा…

बहुत बढिया....

nilesh mathur ने कहा…

आज आपकी कई रचनाएँ पढ़ी, लीक से हटकर बहुत ही बागी तेवर हैं आपकी रचनाओं में, आपकी हिम्मत और लेखनी की दाद देता हूँ, बहुत बहुत शुभकामना!

राकेश कौशिक ने कहा…

"झूठी परंपराओं की वेदी पर...
अपने नेह को घोट पाना
कितना मुश्किल है"
हर "इंसान" की सोच को शब्द देने के लिए आभार और संवेदेनशील रचना के लिए बधाई

apurn ने कहा…

prabal abhiyakti

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

bahut der se aapke blog par hoon anita .. well, i am just speechless.

kabhi kabhi shabd maun ho jaate hai ,kuch kahne ka saamartya nahi rah paata hai ..

main baad me phir kisi din ek ek kavita par kuch na kuch to jarur likhunga.

aapne ek nayi kavita ki dhaara ko janm diya hai ..

aapka bahut aabhar....
kabhi samay mile to mere kavitao ke blog par jarur aaye

www.poemsofvijay.blogspot.com

dhanywaad aapka .

vijay

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi achhi rachna

Richa P Madhwani ने कहा…

khubsurat