www.blogvani.com चिट्ठाजगत

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

काश

काश कि
मैं पत्थर होती
कोई मूर्तिकार आता...
और मुझ पर
गढ़ जाता
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।

10 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत खूब, लाजबाब !

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

नवीन त्यागी ने कहा…

कम शब्दों में सुन्दर अभिव्यक्ति

M VERMA ने कहा…

अनगढे को गढने वाला कोई कुशल शिल्पकार होना चाहिए.

विजयप्रकाश ने कहा…

वाह...अनूठी कल्पना है.

kunwarji's ने कहा…

gaagar me saagar....

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

काश ! कि वो पहला अक्षर भी लिखा होता !

त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने कहा…

काश ! कि वो पहला अक्षर भी लिखा होता !

nilesh mathur ने कहा…

मुझे तो इसमें भी वेदना ही नज़र आ रही है, अपने अस्तित्व को तलाशती एक औरत, जो अपनी खुद की एक अलग पहचान चाहती है!

udaya veer singh ने कहा…

srishti ke rahsyamayi padarth, jo aaj bhi ansuljha hai ,ke sanrakshan samvardhan, ke liye samaj jimmedar hai,
jisamen ham ,aap , rahate hain . aapko shikayat ,naitikata se maryada se hai .
mukarata ka prayas prasansniya hai .aur unmukatata,maryada men nahin aati ."satyam bruyat ,priyam bruyat na bruyat........] .bhavnaon ke nihitarth
sadhuvadji.