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मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

यह पीड़ामयी बयार

बह चली है कैसी,
पीड़ामयी यह बयार,
जो बुनती रहती है,
विपुल क्रन्दन अपार,
अनायास ही दे जाती है
अनचाहे मुझको
अश्रु उत्स उधार,
प्रणय का तुम्हारा चुंबन
मेरी स्मृति बराए जूं आहार,
हाय, नेस्ती छाई है
बन जीवन विहास।
उसकी वाय में घुलना
तुम्हारा ए मेरे अवरुद्ध श्वास,
आज भी दे रहा है
मुझे वही मिश्रित सा अहसास।
तुम ही कहो अब
प्रयण का वह पल,
कैसे भूलूं मैं
बन पलाश।
देखो तो,
तुम्हारा वह भोगी स्पर्श,
नित करता है अट्टहास।
अनीता शर्मा