www.blogvani.com चिट्ठाजगत

बुधवार, 25 मार्च 2009

मैं और मेरा कमरा...

मैं जमीन पर पडे एक गूदड पर रजाई लिए बैठी हूं

ठीक सामने एक संदूक पर,
सिल्वटों भरी मेरी पेंट पडी है
उपर हैंगर पर एक चाइनीज जींच टंगी है,
दो दीवारों पर टिका एक टांड भी है
जिसमें न जाने क्या क्या भरा है
टांड पर पुरानी साडी का परदा
और उसके ठीक नीचे एक डबलडोर फ्रिज रख है
साथ में एक गेंहू की टंकी
तनी खडी है षायद किसी अकड में है
साथ ही सटी है पूजा की अलमारी
जिस पर परदा लगा है
श ssss षायद भगवान सो रहे हैं
इसके नीचे रखी है सिलाई मषीन
और तितर बितर पडे धागे
एक केंडल स्टेंड और
डाइनिंग टेबल सेट की एक कुर्सी
कुल मिलकार पता चलता है
कि मैं
एक मध्यवर्गीय परिवार से हूं

अनिता शर्मा 

कुछ ऐसे मुझे याद करना

तुम्हारी माने तो,
अब हमें जुदा होना होगा,
एक दूजे को हमेशा के लिए,
खोना होगा,
पर सुनो,
कभी गलती से तुम्हें,
अगर मैं स्मरण हो आउं,
तो अपनी आंखे बंद करना,
और हल्के से मुस्करा देना,
उन पलों के लिए,
जो स्नेहपूर्ण थे,
और बाद में मेरे दर्द का आधार बनें,
उन्हें याद करना तब,
जब तुम कभी बहुत दुखी हो,
या,
खुद को अकेला पाओ,
मेरे जख्मों के लिए यह काफी होगा,
तुम्हारा साथ न मिला तो क्या,
जब तुम याद करोगे,
तो मैं हमेशा महक उठूंगी,
मेरी यादों में तुम न हो तो भी,
मैं खुश हो लुंगी
यह सोच कर ही सही,
की
"पता नहीं क्यों आज मन बहुत खुश है"