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मंगलवार, 24 नवंबर 2009

होठों का विपुल क्रंदन

मैं शापमय वर हूं।
(यह पहली पक्ति मेरी अपनी नहीं है।)
किसी के होठों का विपुल क्रंदन हूं,
व्यंत कहीं सूनेपन में,
मैं लहलहाती हुई सूनी लता हूं।
मुझ से रहो दूर,
जो चाहते हो भोगी सुखमय जीवन।
वृकायु से वैदेह के दिए
सूनेपन का
मैं निर्बाध बढ़ता विस्तार हूं।
जान लो मुझे करीब से,
मैं किसी भोगी के विलास से
फूट पड़ी हित्कार हूं।
दुत्कार दिए किसी भिक्षुक की
आंख से टपका पीड़ामयी मल्हार हूं।
टूटी किसी मसी की
मैं दर्द भरी चित्कार हूं।
माधुरी सी मुग्धा कभी थी,
आज विहर वेदना से भरी अपार हूं...
अनिता शर्मा

9 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

दर्द और वेदना साफ़ झलकता है
अच्छी रचना लिखी है आपने

आनन्द राय ने कहा…

viyogi hogaa pahlaa kavi, aah se upjaa hogaa gaan. vaakai aapne hriday kee gahraaiyon se aur dil kee kalam se bhaavnaaon kee dhaara ko gati dee hai, badhaai.

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत डुबा गई - एक अजब से दर्द के अहसास के साथ:

टूटी किसी मसी की
मैं दर्द भरी चित्कार हूं।

ओह्ह!!

समयचक्र -महेन्द्र मिश्र- ने कहा…

बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना .

भारत मल्‍होत्रा ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
CS Devendra K Sharma ने कहा…

achi rachna

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत ही भावुक कर देने वाली रचना .

arvind ने कहा…

दर्द और वेदना साफ़ झलकता है .pls inhe sudharen..:
आज विहर वेदना से भरी अपार हूं... virah ,not vihar.

nilesh mathur ने कहा…

आपकी रचनाओं में इतना दर्द क्यों है?