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मंगलवार, 25 अगस्त 2009

स्नेहमयी पराजय


छीन लो आज मुझसे
मेरा यह भय,
हो जाओ सदा के लिए
कहीं गहन अंधकारमय,
नित क्षणप्रतिक्षण
तुमसे दूर होने का,
यह निर्बाध भय,
निस्वार्थ सा बढ़ता है,
मुझमें अक्षय
बना लो दूरियां मुझसे,
तुम हो निर्भय
न घबराओ परिणाम से
कदाचित तय है
मेरे अस्तित्व का क्षय
क्योंकि मैं स्वयं ही
स्वीकार चुकी हूं,
तुमसे,

अपनी स्नेहमयी पराजय...
अनिता शर्मा

5 टिप्‍पणियां:

भारत मल्‍होत्रा ने कहा…

बहुत सुंदर रचना। मनोभावों की सुंदर अभिव्‍यक्ति

M VERMA ने कहा…

स्नेहमय पराजय की स्वीकार
वाह बहुत खूब

परमजीत बाली ने कहा…

अपने मनोभावों को बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं।बधाई।

संजय भास्कर ने कहा…

सुंदर अभिव्‍यक्ति
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ...

Aneeta Praveen ने कहा…

शुक्रिया!