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बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

अदृश्‍य से तुम---

कागज पर
खाली रेखाओं से बिखरे तुम कभी कभी
मेरे लिखने का आधार बन जाते हो...

होठों पर
आड़ी तिरछी लकीरों से चिपके तुम
कभी सहसा... मुझे छूकर चले जाते हो...

मन के किसी कोने में
सदा सहमे से बैठे रहते हो
कि, जैसे मैने तुम्‍हें अभी अभी
डांटा हो,

अक्‍सर जब
धड़कन रुक जाती है तो अहसास होता है
कि तुम अब भी चल रहे हो
रक्‍त वाहिकाओं में कहीं... और तुम्‍हारा यूं रेंगना
मुझे सिहरन सी दे जाता है।

(अनिता शर्मा)

6 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

अनीता जी मन की उथल पुथल को आपने बहुत सुंदर तरीके से कविता में उतारा है .....बधाई

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा आपने
सचमुच कुछ चीजे आंखों से दूर मगर दिल के पास होती है..

tanu sharmaa... ने कहा…

सारी कशमकश खूबसूरती से शब्दों की शक्ल अख्तियार करती,,,,

विनय ने कहा…

बहुत ख़ूब

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गुलाबी कोंपलें

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा....

रंजना ने कहा…

कोमाल भावों के अनुरूप कोमल शब्द.....बहुत बहुत सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति.वाह !!