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सोमवार, 26 जनवरी 2009

निशब्‍द हूं मैं...

जब पहली बार 

तुमने धीरे से कहा था
''तुम मुझे पसंद हो''
न जाने क्‍यों 
खुद का समेट
एक खोल में 
ढ़क लिया था 
पर सुनो... 
निशब्‍द हूं मैं 
तुम्‍हारी दोस्‍ती पाकर 
तुम हो बिखरी गंध से 
जिसे कभी छूकर खुद में समा लेना चाहा मैंने
तुम हो कुछ सिमटे से...
जिसे उधेड़कर फिर बुनना चाहा मैने,
पर सुनो 
निशब्‍द हूं मै...
तुम्‍हारा साथ पाकर 

9 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

सचमुच भावनाओं को शब्दों में बयान करना कोई आप से सीखे ....और फिर कहे निशब्द हूँ में .....


अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

विनय ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता!

sanjay vyas ने कहा…

sunder. kripya thoda aur vistaar den to padhne ka anand kuchh der aur jaari rahe.

Mired Mirage ने कहा…

सुन्दर !
घुघूती बासूती

Udan Tashtari ने कहा…

भावपूर्ण रचना.

रंजना ने कहा…

sneh nihshabd kar hi deta hai....bahut sundar likha hai aapne.

SANJEEV MISHRA ने कहा…

kavita bahut sundar hai lekin usse bhi sundar aapki profile ki yah panktiyaan :
एक आस लिए जीती हूं, एक प्‍यास जिसे पीती हूं, न जाने क्‍यूं, मन में एक विश्‍वास लिए हूं, फिर भी रीती हूं।

amarjeet kaunke ने कहा…

beautiful poems...bhavnaon ka yeh gahara khaulta samunder mubark....amarjeet kaunke

Aparna Bose ने कहा…

भावपूर्ण अभिव्यक्ति।
blog description भी बहुत सुन्दर लिखा है आपने