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गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

तुम ...

जिसे कहने के लिए,
तुम्‍हारा इंतज़ार था,
वो बात कहीं छूट गई है।
जिसके सिरहाने सर रखकर
सोने को मैं,
बेकरारा थी,
वो रात कहीं टूट गई है।
अतृप्‍त से होठों पर
अक्‍सर जिह्वा फेर देती हूँ
फ़िर सहसा तुम्‍हें याद करने पर
जब कभी तुम हावी होते हो,
मेरी कल्‍पना पर,
सच, वो कुछ ज्‍यादा ही
उतावली हो उठती है,
तुम्‍हें जान पाने को,
तुम्‍हें छू पाने को
और करीब बुलाकर हैरान हो,
पूछने को कि 'अरे तुम यहां कैसे'?