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रविवार, 31 अगस्त 2008

ये अरमान

'अरमान' उढते है,
कभी भी कहीं भी।
अरमान मरते हैं,
कभी भी कहीं भी।
लाखों अरमान,
ऐसे ही क्षण प्रतिक्षण,
जन्‍मते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
क्‍योंकि....
पालने वाले इन अरमानों को,
भी,
उढते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
ये अरमान
जुडा करते हैं
कहीं जन्‍म से
तो कहीं मरण से
कहीं भूख से
तो कहीं धन से,
कहीं सीमा पार से
तो कहीं स्‍वदेश से,
और भी भतेरे कारण हैं
इन अरमानों के
कहीं भी उढने,
कभी भी गिर जाने के।
हमें उढना होगा,
लड़ना होगा,
क्‍यों ?
क्‍योंकि इन अरमानों को,
पाने के लिए,
कोई भी उढ सकता है
कभी भी कहीं भी।

( अनिता शर्मा)