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सोमवार, 11 अगस्त 2008

मेरी चाहत


जीवन की डोर में,
तुम्‍हें पिरोना चाहा है।
उठती- छूटती सांसों में,
न जाने कितनी बार,
तुम्‍हें भर लेना चाहा है।
लिखते- लिखते कितनी ही बार,
मेरी कलम की चौंच ने,
तुम्‍हें चुमना चाहा है।
कागज पर बि खरे रंग सा,
तुम्‍हारा स्‍पर्श,
हाथों से रगड़ रगड़ कर,
पोछना चाहा है।
रम गए हो ,
तुम रोम रोम मेंरे,
पर फिर भी,
खुद से जुदा कर,
न जाने कितनी ही ,
बार तुम्‍हें जी भर,
देखना चाहा।
(अनिता शर्मा)