www.blogvani.com चिट्ठाजगत

सोमवार, 11 अगस्त 2008

मेरी चाहत


जीवन की डोर में,
तुम्‍हें पिरोना चाहा है।
उठती- छूटती सांसों में,
न जाने कितनी बार,
तुम्‍हें भर लेना चाहा है।
लिखते- लिखते कितनी ही बार,
मेरी कलम की चौंच ने,
तुम्‍हें चुमना चाहा है।
कागज पर बि खरे रंग सा,
तुम्‍हारा स्‍पर्श,
हाथों से रगड़ रगड़ कर,
पोछना चाहा है।
रम गए हो ,
तुम रोम रोम मेंरे,
पर फिर भी,
खुद से जुदा कर,
न जाने कितनी ही ,
बार तुम्‍हें जी भर,
देखना चाहा।
(अनिता शर्मा)

4 टिप्‍पणियां:

ram shankar ने कहा…

सच में आपकी लेखनी दिल को छू गयी. अहसास ख़ुद के साथ हो और उसे कागजों पर उतारा जाए तो फिर कहना ही क्या.

yogi ने कहा…

aah man ko sukun aur dil ko tasalli ki likhane ki koi umra nahi hoti. bahut achha. mai bhi aapke sath rachamitra bakar kavita labh pana chahta hu yogendra

निर्झर'नीर ने कहा…

lagta hai ahsason ko had tak jiya hai aapne ..

plz remove the word varification comment dene m problem hoti h

संजय भास्कर ने कहा…

सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
और
अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.