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गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

तुम ...

जिसे कहने के लिए,
तुम्‍हारा इंतज़ार था,
वो बात कहीं छूट गई है।
जिसके सिरहाने सर रखकर
सोने को मैं,
बेकरारा थी,
वो रात कहीं टूट गई है।
अतृप्‍त से होठों पर
अक्‍सर जिह्वा फेर देती हूँ
फ़िर सहसा तुम्‍हें याद करने पर
जब कभी तुम हावी होते हो,
मेरी कल्‍पना पर,
सच, वो कुछ ज्‍यादा ही
उतावली हो उठती है,
तुम्‍हें जान पाने को,
तुम्‍हें छू पाने को
और करीब बुलाकर हैरान हो,
पूछने को कि 'अरे तुम यहां कैसे'?

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

त्रासदी भरी एक रात...

ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं- ओह ! मैने फिर से सिर पकड़ लिया और बड़े बेमन से फोन उठाया। ''क्‍या है'' ? सामने से किसी एक चाहने वाले के वही चिंता भरे शब्‍द जो पिछले आधे घंटे से सुन रही थी, ''कहां पहुंची, दिल्‍ली में तो नहीं है अगर नोएडा है, तो वहीं रूक मैं लेने आता हूं, या ऐसा कर मेरे घर चली जा' मैने इस बार कोई जवाब नहीं दिया, बस चुप, निरुत्‍तर एक अजीब सी हंसी के साथ फोन रख दिया। हंसी शायद कुछ ज्‍यादा ही अजीब थी इसलिए बस में खड़े सभी लोग मुझे अजीब नजर से देखने लगे। अब ये ना पूछिएगा कि वो अजीब नजर कैसी थी, क्‍योंकि जनाब जवाब में मैं फिर वही अजीब हंसी बिखेर दूंगी। इस अजीब- अजीब को समझने के चक्‍कर में आप भी अजीब चक्‍कर में फंस जाएंगे।
13 सितंबर 2008 को ऑफिस से फोन आने का जो सिलसिला शुरु हुआ वो दो दिन बाद तक उसी तरह चलता रहा। खैर, मैं उस रात मैं 8.40 पर जा पहुंची बाराखम्‍बा, ठीक वहीं जहां ब्‍लास्‍ट हुआ था। पहुंचने से पहले मन में एक टीस थी जो निरंतर रुआंसी को उत्‍पश न्‍न कर देती और मैं टपकने से पहले ही खारे आसुंओं का घूंट भर लेती। जब बस से उतरी तो चारों ओर वही 'अजीब' सी चहल पहल। लड़के-लड़की का एक जोड़ा उस भीड से निकलकर आ रहा था, जिनहें देखकर ऐसा लगा मानों सिनेमाघर में कोई शो अभी खत्‍म ही हुआ हो.... यह भी कुछ अजीब ही लगा। मन में उठ रहे कई सवालों के साथ मेरा एक-एक कदम दस-दस मन का हो चला था, हाथ न जाने क्‍यों बार-बार बालों में जा रहे थे और होंठ दांत के नीचे। 30-40 कदमों की यह दूरी आखिरकार खत्‍म हो ही गई और मैनें खुद को पाया संवेदनाओं के एक अथाह समुंद्र के सम्‍मुख जिसे बिना किसी नाव और पाथेह के मुझे पार उतरना था।

ठीक सुलभ शौचालय के सामने बीच में कुछ जगह खाली छोड़ चारों ओर इंसानों की झड़ी सी लगी थी, कुछ नौटंकी करने वाले अपने कैमरों के साथ शौचालय के छतनुमा मंच पर जा विराजमान थे और निरंतर अपनी अभिनय कला को उभारने में लगे थे। मैं उनके अभिनय के गुर सीख रही थी कि सहसा कानों में किसी की गर्म शीशे सी आवाज ने दस्‍तक दी 'यह त्रासदी...' किसी संवाददाता की आवाज थी शायद। आगे उस आवाज ने क्‍या कहा मैने नहीं सुना.... मेरे कानों ने जो शब्‍द देखा वो था 'त्रासदी' फिर क्‍या था कानो देखा सच कहां होता है ? सो आंखों ने भी उसे तलाशना शुरु कर दिया। मैने देखा वहां एक नहीं कई त्रासदियां पसरी पड़ी थी, गहरी नींद में... जिनकी किसी को भनक भी न थी।

कोई हाई-फाई से दिखने वाले फोटोग्राफर साहब आकर कहते हैं ' साले... छोटे छोटे पटाखे छोड़कर हमें परेशान करते हैं... करना ही है तो कुछ बडा करो'। और इसी के साथ मेरी नजर आकर टिक गई इस नई त्रासदी पर। जाहिर है उन जनाब को वहां खून से लथपथ लाशें और रोत बिलखते गरीब चेहरे नहीं मिले, जिनकी तस्‍वीर उतारकर वे पैसे बना पाते। जरा मुंह घुमाया नहीं कि एक और त्रासदी मेरा रास्‍ता रोके खड़ी थी। तीन पुलिस वाले सबके नाम बताना कुछ सही नहीं लगता पर हां एक जनाब जो बहुत ज्‍यादा बोल रहे थे उनकी राशी से वे सिंह थे और बातों न जाने क्‍या थे। तीखी और ऊंची आवाज में उसने कहा 'बहन चो...कहते हैं एक घंटा लेट है पुलिस अब पुलिस क्‍या करे जब पता चला तो चले आए...। इतने पैसे नहीं देते जितने सवाल पूछते हैं, जिसे देखो हमारी ही कॉलर के ऊपर लपकता है'। फिर पता नहीं कितनी बार उसने मीडिया वालों की मां-बहन एक कर दी।

मन खट्टा हो गया, मानों इमली खा ली हो... नहीं, नहीं मानो खाने के बाद मिर्च वाली खट्टी डकार, ओह ! सोचा अब तो मैट्रो से घर की राह ली जाए, पर क्‍या जनाती थी कि आगे एक और त्रासदी टकटकी लगाए मेरी राह देख रही है। जनाब किसी बड़े अखबार के पत्रकारों का गुट खड़ा था नाम नहीं जानती कि कौन कौन थे, पर हां, वो जरूर सुना जो वे बतिया रहे थे 'जरा सोचो... क्‍या होगा हमारे देश का जहां पुलिस के पास निशान लगाने के लिए चॉक न हो, फुटपाथ के पत्‍थरों से जो बाउंड्री लाइन बनाए वहां आतंक से कैसे रुक सकता है।' उनकी बातों में कोई मजेदार त्रासदी नहीं दिखी तो सोचा पैदल पैदल ही निकला जाए.... कि अचानक मैं एक बच्‍चे से टकरा गई, बड़ी फैली आंखें डबडबाई सी, पतले और सिकुडे होंठ... मुस्‍कुरा रहे थे। उसने हाथों में गुब्‍बारे पकड़ रखे थे। अरे, ये तो एक और त्रासदी आ चिपकी मुझसे...। मैने उसे हटाना चाहा पर वो बच्‍चा आज अचानक ही लाइम लाइट मे आ गया – क्‍यों ? अरे भाई त्रासदी की वजह से। छोटी सी उम्र में गुब्‍बारे बेचता है, न जाने क्‍या कारण रहा होगा इसका ? पर इस बारे में सोचने का वक्‍त किसके पास है। यहां तो सभी ' सबसे आगे, सबसे तेज' और 'खबर हर कीमत पर' जुटाने में लगे हैं। सो, कई काले मुंह वाले डिब्‍बों को उस नन्‍हीं सी त्रासदी पर फोकस कर दिया गया, और कान मरोड़े चमगादड़ उसके मुंह के आगे अड़ा दिया, बेचारा बोलता रहा। करता भी क्‍या, आज तो दिन ही त्रासदी का था। मैं कुछ ज्‍यादा ही संवेदनशील हूं, मन भर आया तो वहां से पैर पटककर चल दी।

अब मुझे कानों से देखे शब्‍द 'त्रासदी' पर विश्वास हो आया था, पर यह त्रासदी तो भयानक भूत सी हर जगह मेरे सामने आकर खड़ी होती। जब मीडिया के चीचड़ उस नन्‍हे बच्‍चे से बातों में चिपक रहे थे तभी पुलिस के कोई बड़े अधिकारी वहां आ गए और छिपकर पीछे जा खड़े हुए। थोड़ी देर में जनाब चलते बने। हो गया उनका निरीक्षण पूरा। उम्‍ह...

मैने फिर पैर पटके और वापस चली ही थी कि दो ट्रैफिक पुलिस रॉंग साइड बिना हैलमैट चले आ रहे थे और जहां मुड़ना मना था वे शहंशाह उसी राह से चल दिए। एक ही घंटे में अचानक से इतनी सारी त्रासदियों का सामना करने के लिए मैं तैयार न थी। सो सिर गढाकर वहीं फुटपाथ पर बैठ गई, कि अचानक से एक अजनबी त्रासदी ने दस्‍तक दी। कंधे पर हाथ रखा और कहा... 'ग्राहक नहीं मिला क्‍या? कोई बात नहीं, बता कितने लेगी...? मैने सिर उठाकर देखा तो एक सभ्‍य से पुरुश मेरी ओर लार भरी निगाह के साथ लपलपा रहे थे। कोई उत्‍तर ना पाकर उन्‍होने कहा, 500 रूपए ले लेना, पर सुन जरा जल्‍दी चल ना...। मेरे मन में एक तेज घृणा उत्‍पन्‍न हो आई उस सभ्‍य पुरुश के लिए, उसकी अतृप्‍त भूख के लिए, उसके लार टपकाते अंगों के लिए जो बिना वक्‍त जाने कहीं भी उत्‍सुक हो उठते हैं।

मैं उठी तो, यह त्रासदी कुछ देर तक पीछे आती रही। अब मेरे लिए इतने बोझ के साथ चलना मु‍‍श्किल हो रहा था, कि अचानक बस आई और मैं उसमें जा बैठी। बस में भी कई त्रा‍सदियां डंडे पकड़े खड़ी थी, सभी की निगाहें देर रात अकेली लड़की पर थी, मुझे लगा समाचारों में जिस दिल्‍ली के दुखी होने की बात की जा रही है वह दिल्‍ली तो कहीं और है यह तो नहीं हो सकती। बस में तेजी से गाने की ध्‍वनि रह रह कर छू जाती... 'दुनिया गई तेल लेने...' मैनें आंखें बंद कर ली।

दरअसल, सच तो यह था कि किसी को इन धमाकों से कोई सरोकार न था, सभी अपनी अपनी त्रासदियों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। लगता है कि इस शहर में आदमी तो है ही नहीं, जीवन, भावनाएं, संवेदनाएं सभी बाजारों के बड़े शो-रूमों के शोकेसों में बंद हैं, जिन्‍हें गाहे-बगाहे नुमाइश के लिए खोल दिया जाता है। असल में तो यहां रहने वाला हर शरीर एक त्रासदी की सांस भरता है। जो अक्‍सर छूट कर अखबारों की सुर्खियों में परस जाती है।

रविवार, 31 अगस्त 2008

ये अरमान

'अरमान' उढते है,
कभी भी कहीं भी।
अरमान मरते हैं,
कभी भी कहीं भी।
लाखों अरमान,
ऐसे ही क्षण प्रतिक्षण,
जन्‍मते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
क्‍योंकि....
पालने वाले इन अरमानों को,
भी,
उढते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
ये अरमान
जुडा करते हैं
कहीं जन्‍म से
तो कहीं मरण से
कहीं भूख से
तो कहीं धन से,
कहीं सीमा पार से
तो कहीं स्‍वदेश से,
और भी भतेरे कारण हैं
इन अरमानों के
कहीं भी उढने,
कभी भी गिर जाने के।
हमें उढना होगा,
लड़ना होगा,
क्‍यों ?
क्‍योंकि इन अरमानों को,
पाने के लिए,
कोई भी उढ सकता है
कभी भी कहीं भी।

( अनिता शर्मा)



शनिवार, 30 अगस्त 2008

मेरी श्रृधा

मन में गहरी श्रृधा को लेकर,
पहुंची थी मैं गंगा के तट पर,
पर !खुशी नहीं हुई मुझे,
वहां पहली बार जाकर,
एक पीड़ा उभर आई होठों पर आंखों पर,
रोके न रूक रही थी वो पीड़ी,
टपक टपक कर सबको बता रही थी दुख मेरा,
देखा मैंने,
अनेक श्रृधाओं को,डूबते और तैरते,
व्‍यर्थ होते
उस आटे को,
रूई को,
तेल को,
कपड़े को
और इच्‍छा को,

जिसके लिए किसी के पेट में दर्द होता है,
कोई पूस के अंधेरे में,
नंगे बदन रोता है।
तैर रही थी वहां,
गंदी श्रृधा,
मैली श्रृधा,
जो मेरी पवित्र श्रृधा को,
मैला करने में जुटी थी।
लेकिन कुछ देर बाद मुझे रंज न रहा,
जब देखा मैंने कि एक आदमी ,
मुट्ठी भर आटे को रोता है,
एक आदमी,
उसे अंधी श्रृधा में खोता है।
यकिनन...यकिनन...
इसलिए
'आज' का 'अंधा मानव' रोता
है रोते रोते एक दिन वो मर जाता है।
और उसे बहा दिया जाता है उसी नदी में,
जहां उसे,
चाहे मरने पर ही,
पर रोटी और कपड़ा आखिर
ओह...
।मिल ही जाता है।
(अनिता शर्मा)

सोमवार, 11 अगस्त 2008

मेरी चाहत


जीवन की डोर में,
तुम्‍हें पिरोना चाहा है।
उठती- छूटती सांसों में,
न जाने कितनी बार,
तुम्‍हें भर लेना चाहा है।
लिखते- लिखते कितनी ही बार,
मेरी कलम की चौंच ने,
तुम्‍हें चुमना चाहा है।
कागज पर बि खरे रंग सा,
तुम्‍हारा स्‍पर्श,
हाथों से रगड़ रगड़ कर,
पोछना चाहा है।
रम गए हो ,
तुम रोम रोम मेंरे,
पर फिर भी,
खुद से जुदा कर,
न जाने कितनी ही ,
बार तुम्‍हें जी भर,
देखना चाहा।
(अनिता शर्मा)

गुरुवार, 17 जुलाई 2008

कश्‍मकश

कभी कभी,

ऐसा लगता है ,

कि जैसे,

मैं कहीं खो गई हूं,

किसी और की हो गई हूं।

फिर सहसा ध्‍यान जाता है,

उन पर,

जो मेरे अपने है,

जिनकी आंखों में ,

मुझे लेकर कुछ सपने हैं,

बढ़ता कदम रूक जाता है,

दिल मेरा टूट जाता है।

एक अजीब कश्‍मकश में,

जी रही हूं,

सच,

घूंट जहर के,
पी रही हूं।

(अनिता शर्मा)