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शनिवार, 12 सितंबर 2015

लिख दूं कि छोड़ दूं...

लिख दूं तुम्हें कि छोड़ दूं,
मेरे शब्दों,मेरे भावों
तुम्हें बांधू
या...
यूं ही हिला के छोड़ दूं

--

तुम्हें उड़ने दूँ स्वछंद कोरे पन्ने पर
या..
लपेट कर इक-दूजे में
रचना कोई उकेर दूं

--

निशब्द भावों तुम्हें,
भावहीन शब्दों तुम्हें,
क्योँ न आज,
भावार्थ दूं, शब्दार्थ दूं...

                              -- अनिता

शनिवार, 26 जनवरी 2013

ईश्‍वर का ईश्‍वर


ईश्‍वर का ईश्‍वर... 

कल यकायक जब मन घबरा उठा,
तो मैं सीधें पहुंची मंदिर की दहलीज पर,
नमन कर कहा ईश्‍वर से...
--
मेरे सृजनकर्ता,
परमपिता, पालनहार,
सुन लो मेरी गुहार,
संकट काटो मेरा,
मुझे जन्‍म दिया है तो,
हर दुख हर लो मेरा...

मैं तुम्‍हारी कृति हूं,
खो चुकी अपनी धृति हूं...
यह कह, श्रृद्धा से जब
नम आंखों को जब किया बंद,
यकायक कहीं से सुना एक स्‍वर मंद...

दबा-दबा सा स्‍वर कह रहा था,
तुम... तुम, तुम ही तो हो मेरी सृजनकर्ता,
भला मैं कैसे हुआ तुम्‍हारा दुखहर्ता,
मैंने तुम्‍हारा नहीं,
तुमने मेरा सृजन किया है,

तुम... हां मानव, तुम ही तो हो,
मुझे उत्‍पन्‍न करने वाले,
गढ़ कर पूजने वाले...
और मेरे अस्‍तीत्‍व को बेवजह परमपिता,
मां कह खुद पर मंढने वाले,

सुनो, मुझ पर यूं ही अपनी कृपा बनाए रखना,
मेरा अस्तित्‍व तुमसे है,
यह बात कभी न विसरना,
मेरी कृपा पर तुम नहीं,
तुम्‍हारी कृपा पर मैं जीवित हूं...

देते रहना मुझे यूं ही नियमित,
तुम्‍हारे डर और भावनाओं का आहार,
ताकि मैं कर सकूं जीवित विहार,
...
अंत में,
हे मानव,
मेरा नमन करो स्‍वीकार,
क्‍योंकि तुम ही तो हो,
हां, तुम ही तो हो मेरे पालन हार...

अनिता शर्मा 

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हत्‍या...

मुझे सजा होनी चाहिए,
वह भी फांसी की,
क्‍यों,
क्‍योंकि मैं हत्या की दोषी हूं...
वह भी एक या दो नहीं...
मैं रोज एक हत्‍या करती हूं...
कभी अपने आत्‍मसम्‍मान को,
तो कभी अपने अस्तित्‍व को,
मैं नित नए तरीको से कत्‍ल करती हूं...
--
ओह, मैं भी कितनी मुर्ख हूं...
भला मुझे सजा क्‍यों मिले,
सजा तो जीवित को निर्जीव करने पर मिलती है...
पर मैं,
मुर्दा लाशों में महज खंजर घोपा करती हूं...
रोंदती हूं,
मर चुके अस्तित्‍व को,
और बस यूं ही कभी-कभी खुद को...

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मां, तू बहुत याद आती है...




मां, तू बहुत याद आती है...
ठीक सुबह की नींद सी मीठी तेरी याद,
अक्‍सर रात को नींद न आने वाला दर्द बन जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है,
पलकों के झपकने के नित्‍यकर्म में,
जैसे कभी आंखों में कुछ गिरने पर,
वो फड़फड़ा जाती हैं,
मां, तू बहुत याद आती है...
खाली प्रेम पत्र सा है तेरा नेही हृदय,
न जताने पर अपार संभावनाओं से भरा,
लेकिन जब जताती है,
तो पन्‍नों की कमी पड़ जाती है...
मां, तू बहुत याद आती है...

अनिता शर्मा

बुधवार, 28 मार्च 2012

प्रतीक्षा

मैं कुछ लिखना चाहती हूं... लेकिन शब्‍द कहीं खो गए हैं. मैं कुछ सोचना चाहती हूं... लेकिन भाव कहीं सो गए हैं. मुझे लिखना होगा शब्‍दों के मिलने तक. मुझसे सोचना होगा, भावों के जगने तक... ...अनिता शर्मा

मंगलवार, 23 अगस्त 2011

ओह मेरे सूनेपने...


ओह मेरे एकाकीपन,
ओह मेरे सूनेपने...
अब लगता है कि बहुत हुआ,
बहुत हुआ ये दीवानापन,
बहुत हुआ स्‍नेह,
प्रेम और सहवास,
जी भर गया अब
इन दूषित हो चुके भावों से,
जी है कि जूझा जाए
फिर इनके आभावों से,
मन है कि नष्‍ट हो जाए,
संपूर्ण सृष्टि,
शेष बचूं मैं और मेरा अकेलापन,
ओह मेरे एकाकीपन...
ओह मेरे सूनेपने...

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

क्योंकि मैं आधुनिक हूँ...


मु्झे देखिए,
परखिए और पंसद आने पर
चुन लीजिए,
आप लगा सकते है मेरी बोली,
अरे घबराएं नहीं,
यदि आप पुरुष हैं तो कतई नहीं,
मेरी बोली आपकी जेब पर नहीं पडेंगी भारी,
मैं तो बस आपसे चाहती हूं कुछ झूठे वादे,
कुछ दगा और कुछ कटु शब्‍दों के पक्‍के धागे,
कहिए कि आप मुझे प्‍यार करते हैं,
गर आप चाहते हैं मेरे हाथों को चूमना,
कहें एक ठहाके के साथ कि आप मेरे बिना जी नहीं सकते
और छू लीजिए मेरी कमर को,
और इच्‍छाएं कुछ ज्‍यादा ही हैं,
तो करें एक और झूठा वादा,
शादी का,
फिर देखिए कैसे मैं बिझ जाऊंगी आप के नीचे,
घबराएं नहीं मेरी बोली में केवल बंधन नहीं है,
आप सहजता से पा सकते हैं मुक्ति भी,
क्‍योंकि मैं हूं आधुनिक नारी,
बस कह दें कि नहीं हो सकती शादी,
जरा से उल्‍हाने दें मेरी पढ़ाई और आधुनिकता के,
बस मैं तैयार हो जाऊंगी किसी और के लिए...

सोमवार, 3 जनवरी 2011

ये मेरी भावनाएं...


सुनों ये मृदु हैं,
सोम्‍य, नर्म और बुद्धिहीन हैं.
इन्‍हें देखो
ये मेरी भावनाएं हैं.
अरे-अरे छूओ नहीं,
कुछ कमजोर भी हैं ये.
तुम बस इन्‍हें देखो...
देखो कुछ देर यूं ही,
क्‍योंकि वे जरा संकोची भी हैं,
लचीली और बेहद कोमल,
महसूस करो इनकी
मृदुलता को, सोम्‍यता को
और,
अट्हास करो इनकी बु‍द्धिहीनता का...
अंत में इन्‍हें छूना,
इनसे खेलना,
इन्‍हें चूमना,
तोड़-मरोड़ कर इनके बदन को,
कर देना इनका बलात्‍कार,
वह भी एक नहीं,
कई कई बार,
ताकि ये डर, सहम कर जाएं बैठ
कोने में कहीं,
और दोबारा न कर पाएं
किसी पुरुष संग जुड़ने का दुस्‍साहस...
अनिता शर्मा

शनिवार, 4 सितंबर 2010

निरक्षर हाथों का जोडा

रोज देखती हूं
एक निरक्षर हाथों का जोडा
दिल्‍ली की हर रेड लाइट पर
बेच रहा होता है
साक्षरता का पहला ‘अक्षर’
इस जोडे को शायद
जमा घटा का ज्ञान नहीं
किंतु एक रुपय की कीमत
भली भांती ज्ञात है
मैला सिर, मैले लत्‍ते,
और मैली आंखों में चमकता वो शुद्ध मन...
मुझे रोज याद दिलाता है
कि
वह मेरे साक्षर हाथों का श्रष्‍टा है...
इसलिए ही कहती हूं
जब कभी
अपनी साक्षरता का पर गुरुर हो,
दौड कर उस रेड लाइट पर जाएं
और देखें
आपके हाथों को साक्षर बनाने वाले
वो नन्‍हें हाथों का जोडा
आज भी उसी चौराहे पर
10 रुपय के जोडे के हिसाब से
पैंसिलें बेच रहा है
वही पैंसिल
जिसे पकड
आपने पहला अक्षर लिखा था...

अनिता शर्मा

शनिवार, 29 मई 2010

स्तनों का जोड़ा

अकसर देखती हूं,
राहगीर, नातेरिश्तेदार
और यहां तक कि
मेरे अपने दोस्तयार...
उन्हें घूरघूर कर देखते हैं,
उन की एक झलक को लालायित रहते हैं...
---
आज मैं
उन लालायित आत्माओं को
कहना चाहती हूं,
जिन के लिए वे अकसर मर्यादा भूल जाते हैं,
वह मेरे शरीर का हिस्सा भर हैं...
ठीक वैसे ही, जैसे
मेरे होंठ,
मेरी आंख
और मेरी नाक
या फिर मेरे पांव या हाथ...
---
इसी के साथ
मैं उन से अनुरोध करती हूं...
मेरे मन में यह संशय न उठने दें
कि मैं नारी हूं या महज स्तनों का एकजोड़ा...


अनिता शर्मा

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

बेचैन आयु

मुझे माफ करना जीवन
के मैं तुम्हें न जी सकी,
मुझे तोड़ देना संघर्ष
के मैं तुम्हें न सह सकी...
झूठी परंपराओं की वेदी पर...
अपने नेह को घोट पाना
कितना मुश्किल है
मेरे नेही
तुमने भला कब जाना
इस से तो अच्छा है
पिघल कर घुल जाउं,
लिप्त हो जाउं
तुम में
तुम्हारी प्राण वायु में
खो जाउं वाष्प सी कहीं
कि लौट कर
वापस न आ पाऊं
इस बेचैन आयु में...

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

मेरी एक और मौत

मेरी मौत को
आत्महत्या का नाम न देना
यह तो एक कत्ल है
इस की शिनाख्त करवाना...
समाज के
हर उस ठेकेदार को
इस की सजा दिलवाना
जो मेरी आजादी पर
अपने नियमों का
पहरा दिए रहता था...
हर उस शख्स पर
जुर्माना लगाना
जिस ने मेरे अरमानों को
सहला सहला जवां किया
और परंपराओं की वेदी पर
नग्न कर शोषित किया
उस खास शख्स को
यातना जरूर देना
जिसने झूठे वादों की सेज पर
बार बार मेरा बलात्कार किया...
और हां
अंत में
यह घोषण करना न भूलना
कि
यह आत्महत्या नहीं थी
यह कत्ल था
वह भी अनजाने में नहीं
बल्कि
एक सोच समझी साजिश के तहत...

काश

काश कि
मैं पत्थर होती
कोई मूर्तिकार आता...
और मुझ पर
गढ़ जाता
तुम्हारे नाम का पहला अक्षर।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

मेरा अस्तित्व: वीर्य सा

मेरा अस्तित्व
तुम्हारे हस्तमैथुन से
गिर पड़े उस वीर्य सा है,
जिसे फेंकना
तुम्हारे लिए
जरूरी होगा,
---
काश कि
मेरा अस्तित्व
किसी के पेट में पलते
तुम्हारे वीर्य के
उस कण सा होता
जिसे देखना
तुम्हारे लिए
सबसे जरूरी होगा।

अनिता शर्मा

तुम्हारी यादें...


तुम्हारी यादें...
मसिक धर्म सी
तकलीफ के साथ साथ
देती हैं नारित्व का अहसास।

तुम्हारी अनु

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

स्मृति विहंग

जब कभी
इस विहड़ नीड़ पर
फडफड़ा उठता है
तुम्हारी स्मृति का
चिर-आयु विहंग
उठती है
जाने कैसी विस्मृत सी
दुर्लभ सुगंध...
अकसर जब सांसे
मांगा करती हैं
तुम्हारी सांसों का वही अवैध स्पर्श...
जाने क्यूं हृदय हो उठता है
उन पर
यकायक ही बेहद कर्कष
चुपके से नयनों में
नींद लिए बैठी आंखें
अकसर भूले से
सो भी जाया करती हैं
पर अभागिन
नींद कहां कभी पाया करती हैं
विपुल राग ही बजा करते हैं
होठों की विणा पर
तुम ही कहो मिलन के गीत
गाऊं तो क्योंकर ?
भोगा मेरे हर रस को तुमने
रोद्र रस ही न किया तनिक भी स्पर्श
बतलाओं तो देकर जरा जिव्हा को कष्ट
इस निरस टूटे तारे को अब
भला कौन अपनाएगा सहर्ष...
अनिता शर्मा

मंगलवार, 24 नवंबर 2009

होठों का विपुल क्रंदन

मैं शापमय वर हूं।
(यह पहली पक्ति मेरी अपनी नहीं है।)
किसी के होठों का विपुल क्रंदन हूं,
व्यंत कहीं सूनेपन में,
मैं लहलहाती हुई सूनी लता हूं।
मुझ से रहो दूर,
जो चाहते हो भोगी सुखमय जीवन।
वृकायु से वैदेह के दिए
सूनेपन का
मैं निर्बाध बढ़ता विस्तार हूं।
जान लो मुझे करीब से,
मैं किसी भोगी के विलास से
फूट पड़ी हित्कार हूं।
दुत्कार दिए किसी भिक्षुक की
आंख से टपका पीड़ामयी मल्हार हूं।
टूटी किसी मसी की
मैं दर्द भरी चित्कार हूं।
माधुरी सी मुग्धा कभी थी,
आज विहर वेदना से भरी अपार हूं...
अनिता शर्मा

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

यह पीड़ामयी बयार

बह चली है कैसी,
पीड़ामयी यह बयार,
जो बुनती रहती है,
विपुल क्रन्दन अपार,
अनायास ही दे जाती है
अनचाहे मुझको
अश्रु उत्स उधार,
प्रणय का तुम्हारा चुंबन
मेरी स्मृति बराए जूं आहार,
हाय, नेस्ती छाई है
बन जीवन विहास।
उसकी वाय में घुलना
तुम्हारा ए मेरे अवरुद्ध श्वास,
आज भी दे रहा है
मुझे वही मिश्रित सा अहसास।
तुम ही कहो अब
प्रयण का वह पल,
कैसे भूलूं मैं
बन पलाश।
देखो तो,
तुम्हारा वह भोगी स्पर्श,
नित करता है अट्टहास।
अनीता शर्मा

गुरुवार, 1 अक्तूबर 2009

नस्ती सी पल्लवी


मैं वंच्य सी,
एक वंचिता,
जिसे प्रायः
सभी ने ठगा.
वृषक तो आए,
कई मुझ तक,
हो लालायित
इस नीरव योवन पर,
किंतु वहन न किया मेरा...
इस पर भी
अंजिर तक मेरे,
प्रेष्ठ तुम्हारा यूं आना
और आकर चले जाना...
सहसा कभी यूं ही
मुझ नय को
नीरव ध्वनि से
पुल्कित करना,
सच!
याद रहेगा मुझको
नित यूं,
तुम्हारा मुझे वलना.
कुछ यूं नेम रहा
स्नेह सूत्र हमारा...
जैसे नस्ती सी पल्लवी को
मिल गया हो
क्षितिज का कोई किनारा...

सिर्फ़ तुम्हारी 'अतृप्त ' अनु

सोमवार, 14 सितंबर 2009

बनना और बिखरना

कभी नहीं चाहा था
कि मैं किसी के बिस्तर की,
सिल्वट भर बन रहूं,
कुछ ऐसी
कि उठने पर,
उसे खुद न पता हो
कि किस करवट से,
उभर आई थी मैं.
जरा गौर से देखो,
हमारा रिश्ता,
कुछ ऐसा ही तो है,
हां,
मैं हमेशा चाहते,
न चाहते
तुम्हारे सामने बिछ जाती हूं,
तुम उठते हो
और मुझे झाड़ देते हो
सदा के लिए...
तुम्हारी कसम
सच कहती हूं,
यह सोचकर अजीब लगता है
कि
मेरे अस्तित्व का बनना
और
बन कर बिखर जाना
तुम्हारे ऊपर ही निर्भर करता है.

अनिता शर्मा

शनिवार, 12 सितंबर 2009

वो अदना सी चादर

रोज की तरह,
मैं अपनी मुश्क से मुंह ठके
सोने चली थी.
रोज की तरह
तुम्हारी यादों के
भूखे भेडिये भी
झपट पड़े थे.
यकायक
चेहरे पर पड़ी चादर ने,
मेरे होठों को छू लिया.
मुझे लगा यह तो तुम हो,
पर...
न न तुम कैसे हो सकते हो भला,
इतने आत्मिय ?
अब तो
करीब आकर वह
मेरे गालों से लिपट गई.
मैं सिहर गई,
मैंने आंखों को जोर से मूंद लिया,
और जी भर तुम्हें चूम लिया...
रोज की ही तरह,
एक और रात
तुम्हारे साथ गुजर गई.
पर हां,
कुछ अलग थी वह.
क्योंकि उस रात से
वह अदना सी चादर भी
मेरे लिए खास बन गई.

अनिता शर्मा

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

नियती

मेरी कलम,
आज अजीब जीद कर रही है,
लंबी सी है,
फन उठाए बार बार मुझे डस रही है,
कहती है,
तुम्हारे बारे में नहीं लिखेगी,
अवहेलना के तीखें दंश,
और नहीं सहेगी...
नासमझ है
मुंह पर पुते,
कीचड़ को,
कागज पर रगड़ उतारने से,
मना जो कर रही है...

अब तुम ही समझाओ इसे
कि अवहेलना ही सही,
पर तुम्हारा दिया कुछ तो है,
इसके बेचारगी भरे जीवन में,
जो इस के नग्न शरीर पर,
वस्त्र सा पड़ा रहता है,
दुखता हो तो भी क्या,
अवहेलना सहसह कर
मुंह उठाए फिरफ़िर
तुम्हारी ओर दौड़ना,
यही तो इस की नियती है।

(अनीता शर्मा)

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

स्नेहमयी पराजय


छीन लो आज मुझसे
मेरा यह भय,
हो जाओ सदा के लिए
कहीं गहन अंधकारमय,
नित क्षणप्रतिक्षण
तुमसे दूर होने का,
यह निर्बाध भय,
निस्वार्थ सा बढ़ता है,
मुझमें अक्षय
बना लो दूरियां मुझसे,
तुम हो निर्भय
न घबराओ परिणाम से
कदाचित तय है
मेरे अस्तित्व का क्षय
क्योंकि मैं स्वयं ही
स्वीकार चुकी हूं,
तुमसे,

अपनी स्नेहमयी पराजय...
अनिता शर्मा

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

तेरे ख्वाबों के तिनके

तुझे भूलने की हर कोशिश में नाकाम हो जाती हूं
तुझे भूलते भूलते तुझमें ही कहीं खो जाती हूं मैं

हर वक्त तेरी यादों पे मिट~टी डाल देती हूं
पर अगले ही पल उसकी छांव में खुद को सोया हुआ पाती हूं मैं

खंजर ए जुदाई को सिने से निकाल देती हूं,
पर अगले ही पल खुद को लहूलुहान पाती हूं मैं

दूर होकर भी छीपा है तू मुझमें ही कहीं
हर वक्त तेरी सांसों की आहट से सिहर जाती हूं मैं

घर की दीवारों से बातें किया करती हूं
सपनों की हकीकत में कहीं एक जिंदगी जी जाती हूं मैं

रोज तेरे ख्वाबों की उम्मीद लिए सोती हूं
पर उठने पर ख्वाबों के तिनकों को बिखरा पाती हूं मैं

सोचती हूं दरवाजे पर दस्तक दी है तुने
पर बाहर जाने पर बस तेरी उम्मीद को खडा पाती हूं मैं

अनिता शर्मा

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

सबब

जाने क्या सबब था,

तेरे इकरार ए मुहब्बत में,

मुझे बेघर सा कर दिया है,

अपने ही घरोंदे से।

दर बदर भटक रही हूं,

कि कोई तो आशियां मिलेगा इस जमाने में।

आशियां न सही दिल को बहला लूंगी मैं,

तेरे दिल के बस छोटे से कोने में।

बस एक बार इतना बता दे,

के कितना यकीन करूं,

तेरे बेवफा न होने में।

हर जख्म को छिपा कर रख सकती हूं,

हंसी के दामन में,

पर,

उस वक्त जब हंसी ही जख्म बन जाएगी,

तो जाने क्या मजा होगातेरे कांधे पर सर रखकर रोने में।

जानती हूं ज्यादा न सही थोडा ही,

पर दर्द तो जरूर होगा तेरे भी सीने में।


तुम्हारी अनु

बुधवार, 25 मार्च 2009

मैं और मेरा कमरा...

मैं जमीन पर पडे एक गूदड पर रजाई लिए बैठी हूं

ठीक सामने एक संदूक पर,
सिल्वटों भरी मेरी पेंट पडी है
उपर हैंगर पर एक चाइनीज जींच टंगी है,
दो दीवारों पर टिका एक टांड भी है
जिसमें न जाने क्या क्या भरा है
टांड पर पुरानी साडी का परदा
और उसके ठीक नीचे एक डबलडोर फ्रिज रख है
साथ में एक गेंहू की टंकी
तनी खडी है षायद किसी अकड में है
साथ ही सटी है पूजा की अलमारी
जिस पर परदा लगा है
श ssss षायद भगवान सो रहे हैं
इसके नीचे रखी है सिलाई मषीन
और तितर बितर पडे धागे
एक केंडल स्टेंड और
डाइनिंग टेबल सेट की एक कुर्सी
कुल मिलकार पता चलता है
कि मैं
एक मध्यवर्गीय परिवार से हूं

अनिता शर्मा 

कुछ ऐसे मुझे याद करना

तुम्हारी माने तो,
अब हमें जुदा होना होगा,
एक दूजे को हमेशा के लिए,
खोना होगा,
पर सुनो,
कभी गलती से तुम्हें,
अगर मैं स्मरण हो आउं,
तो अपनी आंखे बंद करना,
और हल्के से मुस्करा देना,
उन पलों के लिए,
जो स्नेहपूर्ण थे,
और बाद में मेरे दर्द का आधार बनें,
उन्हें याद करना तब,
जब तुम कभी बहुत दुखी हो,
या,
खुद को अकेला पाओ,
मेरे जख्मों के लिए यह काफी होगा,
तुम्हारा साथ न मिला तो क्या,
जब तुम याद करोगे,
तो मैं हमेशा महक उठूंगी,
मेरी यादों में तुम न हो तो भी,
मैं खुश हो लुंगी
यह सोच कर ही सही,
की
"पता नहीं क्यों आज मन बहुत खुश है"

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

वो कुछ लावारिस चीजें


जरा उठो,
और अपने सिरहाने तक जाओ,
वहां जो तुम्हारे बिस्तर पर सिलवटें पड़ी हैं,
वो सिर्फ तुम्हारी नहीं हैं,
वहां से कुछ दूरी पर,
चूड़ी का एक टूटा टुकड़ा पड़ा है,
वो भी सिर्फ मेरा नहीं है,
अकसर लोग जुदा होने पर,
अपनी चीजें मांगते हैं,
पर मैं,
तुमसे कुछ नहीं मांगूंगी,
क्योंकि,
वो चीजें न सिर्फ मेरी हैं,
और न ही सिर्फ तुम्हारी,
वो सभी चीजें और पल हमारे हैं,
और जब हम कहीं खो गया,
तो जान लो,
कि वो अनमोल चीजें,
अब लावारिस हो चुकी हैं,
अब खड़े क्या हो,
उठो और उन्हें उठाकर...
घर से बाहर फेंक दो...

(अनिता शर्मा)

बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

अदृश्‍य से तुम---

कागज पर
खाली रेखाओं से बिखरे तुम कभी कभी
मेरे लिखने का आधार बन जाते हो...

होठों पर
आड़ी तिरछी लकीरों से चिपके तुम
कभी सहसा... मुझे छूकर चले जाते हो...

मन के किसी कोने में
सदा सहमे से बैठे रहते हो
कि, जैसे मैने तुम्‍हें अभी अभी
डांटा हो,

अक्‍सर जब
धड़कन रुक जाती है तो अहसास होता है
कि तुम अब भी चल रहे हो
रक्‍त वाहिकाओं में कहीं... और तुम्‍हारा यूं रेंगना
मुझे सिहरन सी दे जाता है।

(अनिता शर्मा)

सोमवार, 26 जनवरी 2009

निशब्‍द हूं मैं...

जब पहली बार 

तुमने धीरे से कहा था
''तुम मुझे पसंद हो''
न जाने क्‍यों 
खुद का समेट
एक खोल में 
ढ़क लिया था 
पर सुनो... 
निशब्‍द हूं मैं 
तुम्‍हारी दोस्‍ती पाकर 
तुम हो बिखरी गंध से 
जिसे कभी छूकर खुद में समा लेना चाहा मैंने
तुम हो कुछ सिमटे से...
जिसे उधेड़कर फिर बुनना चाहा मैने,
पर सुनो 
निशब्‍द हूं मै...
तुम्‍हारा साथ पाकर 

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2008

तुम ...

जिसे कहने के लिए,
तुम्‍हारा इंतज़ार था,
वो बात कहीं छूट गई है।
जिसके सिरहाने सर रखकर
सोने को मैं,
बेकरारा थी,
वो रात कहीं टूट गई है।
अतृप्‍त से होठों पर
अक्‍सर जिह्वा फेर देती हूँ
फ़िर सहसा तुम्‍हें याद करने पर
जब कभी तुम हावी होते हो,
मेरी कल्‍पना पर,
सच, वो कुछ ज्‍यादा ही
उतावली हो उठती है,
तुम्‍हें जान पाने को,
तुम्‍हें छू पाने को
और करीब बुलाकर हैरान हो,
पूछने को कि 'अरे तुम यहां कैसे'?

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

त्रासदी भरी एक रात...

ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं-ट्रुं- ओह ! मैने फिर से सिर पकड़ लिया और बड़े बेमन से फोन उठाया। ''क्‍या है'' ? सामने से किसी एक चाहने वाले के वही चिंता भरे शब्‍द जो पिछले आधे घंटे से सुन रही थी, ''कहां पहुंची, दिल्‍ली में तो नहीं है अगर नोएडा है, तो वहीं रूक मैं लेने आता हूं, या ऐसा कर मेरे घर चली जा' मैने इस बार कोई जवाब नहीं दिया, बस चुप, निरुत्‍तर एक अजीब सी हंसी के साथ फोन रख दिया। हंसी शायद कुछ ज्‍यादा ही अजीब थी इसलिए बस में खड़े सभी लोग मुझे अजीब नजर से देखने लगे। अब ये ना पूछिएगा कि वो अजीब नजर कैसी थी, क्‍योंकि जनाब जवाब में मैं फिर वही अजीब हंसी बिखेर दूंगी। इस अजीब- अजीब को समझने के चक्‍कर में आप भी अजीब चक्‍कर में फंस जाएंगे।
13 सितंबर 2008 को ऑफिस से फोन आने का जो सिलसिला शुरु हुआ वो दो दिन बाद तक उसी तरह चलता रहा। खैर, मैं उस रात मैं 8.40 पर जा पहुंची बाराखम्‍बा, ठीक वहीं जहां ब्‍लास्‍ट हुआ था। पहुंचने से पहले मन में एक टीस थी जो निरंतर रुआंसी को उत्‍पश न्‍न कर देती और मैं टपकने से पहले ही खारे आसुंओं का घूंट भर लेती। जब बस से उतरी तो चारों ओर वही 'अजीब' सी चहल पहल। लड़के-लड़की का एक जोड़ा उस भीड से निकलकर आ रहा था, जिनहें देखकर ऐसा लगा मानों सिनेमाघर में कोई शो अभी खत्‍म ही हुआ हो.... यह भी कुछ अजीब ही लगा। मन में उठ रहे कई सवालों के साथ मेरा एक-एक कदम दस-दस मन का हो चला था, हाथ न जाने क्‍यों बार-बार बालों में जा रहे थे और होंठ दांत के नीचे। 30-40 कदमों की यह दूरी आखिरकार खत्‍म हो ही गई और मैनें खुद को पाया संवेदनाओं के एक अथाह समुंद्र के सम्‍मुख जिसे बिना किसी नाव और पाथेह के मुझे पार उतरना था।

ठीक सुलभ शौचालय के सामने बीच में कुछ जगह खाली छोड़ चारों ओर इंसानों की झड़ी सी लगी थी, कुछ नौटंकी करने वाले अपने कैमरों के साथ शौचालय के छतनुमा मंच पर जा विराजमान थे और निरंतर अपनी अभिनय कला को उभारने में लगे थे। मैं उनके अभिनय के गुर सीख रही थी कि सहसा कानों में किसी की गर्म शीशे सी आवाज ने दस्‍तक दी 'यह त्रासदी...' किसी संवाददाता की आवाज थी शायद। आगे उस आवाज ने क्‍या कहा मैने नहीं सुना.... मेरे कानों ने जो शब्‍द देखा वो था 'त्रासदी' फिर क्‍या था कानो देखा सच कहां होता है ? सो आंखों ने भी उसे तलाशना शुरु कर दिया। मैने देखा वहां एक नहीं कई त्रासदियां पसरी पड़ी थी, गहरी नींद में... जिनकी किसी को भनक भी न थी।

कोई हाई-फाई से दिखने वाले फोटोग्राफर साहब आकर कहते हैं ' साले... छोटे छोटे पटाखे छोड़कर हमें परेशान करते हैं... करना ही है तो कुछ बडा करो'। और इसी के साथ मेरी नजर आकर टिक गई इस नई त्रासदी पर। जाहिर है उन जनाब को वहां खून से लथपथ लाशें और रोत बिलखते गरीब चेहरे नहीं मिले, जिनकी तस्‍वीर उतारकर वे पैसे बना पाते। जरा मुंह घुमाया नहीं कि एक और त्रासदी मेरा रास्‍ता रोके खड़ी थी। तीन पुलिस वाले सबके नाम बताना कुछ सही नहीं लगता पर हां एक जनाब जो बहुत ज्‍यादा बोल रहे थे उनकी राशी से वे सिंह थे और बातों न जाने क्‍या थे। तीखी और ऊंची आवाज में उसने कहा 'बहन चो...कहते हैं एक घंटा लेट है पुलिस अब पुलिस क्‍या करे जब पता चला तो चले आए...। इतने पैसे नहीं देते जितने सवाल पूछते हैं, जिसे देखो हमारी ही कॉलर के ऊपर लपकता है'। फिर पता नहीं कितनी बार उसने मीडिया वालों की मां-बहन एक कर दी।

मन खट्टा हो गया, मानों इमली खा ली हो... नहीं, नहीं मानो खाने के बाद मिर्च वाली खट्टी डकार, ओह ! सोचा अब तो मैट्रो से घर की राह ली जाए, पर क्‍या जनाती थी कि आगे एक और त्रासदी टकटकी लगाए मेरी राह देख रही है। जनाब किसी बड़े अखबार के पत्रकारों का गुट खड़ा था नाम नहीं जानती कि कौन कौन थे, पर हां, वो जरूर सुना जो वे बतिया रहे थे 'जरा सोचो... क्‍या होगा हमारे देश का जहां पुलिस के पास निशान लगाने के लिए चॉक न हो, फुटपाथ के पत्‍थरों से जो बाउंड्री लाइन बनाए वहां आतंक से कैसे रुक सकता है।' उनकी बातों में कोई मजेदार त्रासदी नहीं दिखी तो सोचा पैदल पैदल ही निकला जाए.... कि अचानक मैं एक बच्‍चे से टकरा गई, बड़ी फैली आंखें डबडबाई सी, पतले और सिकुडे होंठ... मुस्‍कुरा रहे थे। उसने हाथों में गुब्‍बारे पकड़ रखे थे। अरे, ये तो एक और त्रासदी आ चिपकी मुझसे...। मैने उसे हटाना चाहा पर वो बच्‍चा आज अचानक ही लाइम लाइट मे आ गया – क्‍यों ? अरे भाई त्रासदी की वजह से। छोटी सी उम्र में गुब्‍बारे बेचता है, न जाने क्‍या कारण रहा होगा इसका ? पर इस बारे में सोचने का वक्‍त किसके पास है। यहां तो सभी ' सबसे आगे, सबसे तेज' और 'खबर हर कीमत पर' जुटाने में लगे हैं। सो, कई काले मुंह वाले डिब्‍बों को उस नन्‍हीं सी त्रासदी पर फोकस कर दिया गया, और कान मरोड़े चमगादड़ उसके मुंह के आगे अड़ा दिया, बेचारा बोलता रहा। करता भी क्‍या, आज तो दिन ही त्रासदी का था। मैं कुछ ज्‍यादा ही संवेदनशील हूं, मन भर आया तो वहां से पैर पटककर चल दी।

अब मुझे कानों से देखे शब्‍द 'त्रासदी' पर विश्वास हो आया था, पर यह त्रासदी तो भयानक भूत सी हर जगह मेरे सामने आकर खड़ी होती। जब मीडिया के चीचड़ उस नन्‍हे बच्‍चे से बातों में चिपक रहे थे तभी पुलिस के कोई बड़े अधिकारी वहां आ गए और छिपकर पीछे जा खड़े हुए। थोड़ी देर में जनाब चलते बने। हो गया उनका निरीक्षण पूरा। उम्‍ह...

मैने फिर पैर पटके और वापस चली ही थी कि दो ट्रैफिक पुलिस रॉंग साइड बिना हैलमैट चले आ रहे थे और जहां मुड़ना मना था वे शहंशाह उसी राह से चल दिए। एक ही घंटे में अचानक से इतनी सारी त्रासदियों का सामना करने के लिए मैं तैयार न थी। सो सिर गढाकर वहीं फुटपाथ पर बैठ गई, कि अचानक से एक अजनबी त्रासदी ने दस्‍तक दी। कंधे पर हाथ रखा और कहा... 'ग्राहक नहीं मिला क्‍या? कोई बात नहीं, बता कितने लेगी...? मैने सिर उठाकर देखा तो एक सभ्‍य से पुरुश मेरी ओर लार भरी निगाह के साथ लपलपा रहे थे। कोई उत्‍तर ना पाकर उन्‍होने कहा, 500 रूपए ले लेना, पर सुन जरा जल्‍दी चल ना...। मेरे मन में एक तेज घृणा उत्‍पन्‍न हो आई उस सभ्‍य पुरुश के लिए, उसकी अतृप्‍त भूख के लिए, उसके लार टपकाते अंगों के लिए जो बिना वक्‍त जाने कहीं भी उत्‍सुक हो उठते हैं।

मैं उठी तो, यह त्रासदी कुछ देर तक पीछे आती रही। अब मेरे लिए इतने बोझ के साथ चलना मु‍‍श्किल हो रहा था, कि अचानक बस आई और मैं उसमें जा बैठी। बस में भी कई त्रा‍सदियां डंडे पकड़े खड़ी थी, सभी की निगाहें देर रात अकेली लड़की पर थी, मुझे लगा समाचारों में जिस दिल्‍ली के दुखी होने की बात की जा रही है वह दिल्‍ली तो कहीं और है यह तो नहीं हो सकती। बस में तेजी से गाने की ध्‍वनि रह रह कर छू जाती... 'दुनिया गई तेल लेने...' मैनें आंखें बंद कर ली।

दरअसल, सच तो यह था कि किसी को इन धमाकों से कोई सरोकार न था, सभी अपनी अपनी त्रासदियों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। लगता है कि इस शहर में आदमी तो है ही नहीं, जीवन, भावनाएं, संवेदनाएं सभी बाजारों के बड़े शो-रूमों के शोकेसों में बंद हैं, जिन्‍हें गाहे-बगाहे नुमाइश के लिए खोल दिया जाता है। असल में तो यहां रहने वाला हर शरीर एक त्रासदी की सांस भरता है। जो अक्‍सर छूट कर अखबारों की सुर्खियों में परस जाती है।

रविवार, 31 अगस्त 2008

ये अरमान

'अरमान' उढते है,
कभी भी कहीं भी।
अरमान मरते हैं,
कभी भी कहीं भी।
लाखों अरमान,
ऐसे ही क्षण प्रतिक्षण,
जन्‍मते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
क्‍योंकि....
पालने वाले इन अरमानों को,
भी,
उढते और मरते हैं
कभी भी कहीं भी।
ये अरमान
जुडा करते हैं
कहीं जन्‍म से
तो कहीं मरण से
कहीं भूख से
तो कहीं धन से,
कहीं सीमा पार से
तो कहीं स्‍वदेश से,
और भी भतेरे कारण हैं
इन अरमानों के
कहीं भी उढने,
कभी भी गिर जाने के।
हमें उढना होगा,
लड़ना होगा,
क्‍यों ?
क्‍योंकि इन अरमानों को,
पाने के लिए,
कोई भी उढ सकता है
कभी भी कहीं भी।

( अनिता शर्मा)



शनिवार, 30 अगस्त 2008

मेरी श्रृधा

मन में गहरी श्रृधा को लेकर,
पहुंची थी मैं गंगा के तट पर,
पर !खुशी नहीं हुई मुझे,
वहां पहली बार जाकर,
एक पीड़ा उभर आई होठों पर आंखों पर,
रोके न रूक रही थी वो पीड़ी,
टपक टपक कर सबको बता रही थी दुख मेरा,
देखा मैंने,
अनेक श्रृधाओं को,डूबते और तैरते,
व्‍यर्थ होते
उस आटे को,
रूई को,
तेल को,
कपड़े को
और इच्‍छा को,

जिसके लिए किसी के पेट में दर्द होता है,
कोई पूस के अंधेरे में,
नंगे बदन रोता है।
तैर रही थी वहां,
गंदी श्रृधा,
मैली श्रृधा,
जो मेरी पवित्र श्रृधा को,
मैला करने में जुटी थी।
लेकिन कुछ देर बाद मुझे रंज न रहा,
जब देखा मैंने कि एक आदमी ,
मुट्ठी भर आटे को रोता है,
एक आदमी,
उसे अंधी श्रृधा में खोता है।
यकिनन...यकिनन...
इसलिए
'आज' का 'अंधा मानव' रोता
है रोते रोते एक दिन वो मर जाता है।
और उसे बहा दिया जाता है उसी नदी में,
जहां उसे,
चाहे मरने पर ही,
पर रोटी और कपड़ा आखिर
ओह...
।मिल ही जाता है।
(अनिता शर्मा)

सोमवार, 11 अगस्त 2008

मेरी चाहत


जीवन की डोर में,
तुम्‍हें पिरोना चाहा है।
उठती- छूटती सांसों में,
न जाने कितनी बार,
तुम्‍हें भर लेना चाहा है।
लिखते- लिखते कितनी ही बार,
मेरी कलम की चौंच ने,
तुम्‍हें चुमना चाहा है।
कागज पर बि खरे रंग सा,
तुम्‍हारा स्‍पर्श,
हाथों से रगड़ रगड़ कर,
पोछना चाहा है।
रम गए हो ,
तुम रोम रोम मेंरे,
पर फिर भी,
खुद से जुदा कर,
न जाने कितनी ही ,
बार तुम्‍हें जी भर,
देखना चाहा।
(अनिता शर्मा)

गुरुवार, 17 जुलाई 2008

कश्‍मकश

कभी कभी,

ऐसा लगता है ,

कि जैसे,

मैं कहीं खो गई हूं,

किसी और की हो गई हूं।

फिर सहसा ध्‍यान जाता है,

उन पर,

जो मेरे अपने है,

जिनकी आंखों में ,

मुझे लेकर कुछ सपने हैं,

बढ़ता कदम रूक जाता है,

दिल मेरा टूट जाता है।

एक अजीब कश्‍मकश में,

जी रही हूं,

सच,

घूंट जहर के,
पी रही हूं।

(अनिता शर्मा)